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स्वास्थ्य सेवाओं में वंचित वर्गों पर विशेष फोकस से ही दूर होगा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण

| Jan 13, 2020

के. श्रीनाथ रेड्डी

स्वास्थ्य को प्रायः व्यक्तिगत मामला माना जाता है जिसका कोई व्यक्ति निजी स्तर पर आनंद ले सकता है, सजग रह सकता है या फिर सुधार के लिए प्रयास कर सकता है। इस नजरिया से किसी व्यक्ति के खराब स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदारी उसी पर आती है। इस तरह स्वास्थ्य सेवाएं लेने के लिए शारीरिक, वित्तीय और भावनात्मक दबाव भी उसी व्यक्ति पर आता है। पूरी आबादी के बेहतर स्वास्थ्य में समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तंत्र की भूमिका और व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर इसके असर के बारे में अभी कोई स्पष्ट नजरिया नहीं है।

व्यक्तिगत स्तर पर जीवन की किसी अवस्था में स्वास्थ्य और बीमारी के बीच संतुलन निर्धारित करने वाले जीव विज्ञान, मान्यता और व्यवहार के बीच परस्पर जुड़ाव के बारे में कोई वैज्ञानिक जानकारी नहीं है। वास्तव में, इस तरह की वैज्ञानिक जानकारी रोचक होगी, फिर चाहे अनुवांशिक प्रभाव की भूमिका हो, हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले शरीर में मौजूद असंख्य सूक्ष्मजीव हों, दैनिक आदतों और जीन में बदलाव लाने वाले बाहरी पर्यावरण का प्रभाव हो या फिर हमारा आहार, गतिविधियों और नींद की आदत के संबंध में कोई जानकारी हो।

हालांकि व्यक्तिगत विशेषताएं भी उन कारकों से प्रभावित होती हैं, जो परिवार और समुदाय के स्तर पर प्रभावी होते हैं। इनमें स्वास्थ्य को लेकर अवधारणा भी शामिल है जो संस्कृति से निर्धारित होती है और मीडिया और मार्केटिंग से मजबूत होती है। परिवार के स्तर की प्राथमिकताएं स्वास्थ्यवर्धक भोजन की खरीद और तंबाकू और अल्कोहल जैसे अपव्ययों से वित्तीय संसाधनों का निर्धारण होता है। घरेलू स्तर पर भोजन और स्वास्थ्य के मामले में लैंगिक भेद दूसरी पूर्वाग्रही प्राथमिकताएं तय करने का दूसरा कारक है। कॉमर्शियल सेंटर की खातिर मनोरंजन और शारीरिक व्यायाम के हरे-भरे मैदान त्याग देने और बेरोकटोक वाहन वृद्धि और कोयला आधारित पावर प्लांटों से होने वाले प्रदूषण के खतरों को नजरंदाज करना सामुदायिक स्तर पर प्राथमिकताओं को बिगाड़ना है।

इसके बाद, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर तय होने वाली नीतियों से प्राथमिकता तय होती हैं। ये नीतियां देश की आर्थिक विकास दर के अनुसार तय होती हैं। इसमें अहम बात यह है कि विकास का फायदा समाज के विभिन्न तबकों को कैसे दिया जाता है क्योंकि असमानता से स्वस्थ समाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

इस तरह की असमानता धर्म, जाति और सामाजिक स्तर पर सक्रिय अथवा निष्क्रिय रूप में दिखाई देती है लेकिन इसके असर खराब स्वास्थ्य के रूप में अवश्य दिखाई देता है। वैश्विक स्तर पर, बीमारी फैलाने वाले कारक जैसे तंबाकू और अस्वास्थ्यकर खाद्य वस्तुएं और पेय पदार्थ खराब स्वास्थ्य के वाहक बनते हैं। व्यापार से दवाइयों, स्वास्थ्य संबंधी तकनीक और पौष्टिक आहार की उपलब्धता पर भी प्रभाव पड़ता है। उच्च स्तरीय कारक स्वास्थ्य (आर्थिक, व्यावसायिक और सामाजिक) को अधिकाधिक प्रभावित कर रहे हैं (विश्व स्वास्थ्य संगठन, 2008)। स्वास्थ्य मंत्रालयों द्वारा निर्धारित स्वास्थ्य नीति आमतौर पर उन सेवाओं तक सीमित रहती है, जिन्हें मंत्रालय संचालित करते हैं। जबकि स्वास्थ्य नीतियों में उन सभी कारकों को शामिल किया जाना चाहिए जिनसे स्वास्थ्य को प्रभावित होता है।

व्यापार जैसे पेचीदा पहलू को अलग रखकर प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले सामाजिक कारकों का निर्धारण करने वाली स्वास्थ्य प्रणाली को ही नीति में शामिल करने से यह बहुत व्यापक हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी और उनके प्रभाव के आंकलन के लिए किसी स्वास्थ्य मंत्रालय के नजरिये से डब्ल्यूएचओ ने स्वास्थ्य प्रणाली में छह प्रमुख कारकों को शामिल किया है (डब्ल्यूएचओ, 2000)। इन कारकों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा, आवश्यक स्वास्थ्य कर्मी, आवश्यक दवाइयों और तकनीकों की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं की फंडिंग का स्तर, स्वास्थ्य सूचना प्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गवर्नेंस शामिल हैं। निश्चित ही स्वास्थ्य मंत्रालय नीति बनाते समय इन बिंदुओं पर विस्तार से विमर्श करते हैं। लेकिन डब्ल्यूएचओ के कारकों की इस सूची में एक अहम कारक गायब है। स्वास्थ्य सेवाओं की मांग के अनुरूप उपलब्धता, डिलीवरी, निगरानी और आंकलन में समुदाय की भूमिका और उसे शामिल करना इस सूची में नहीं है। इसे शामिल न किए स्तर पर, बीमारी फैलाने वाले कारक जैसे तंबाकू और अस्वास्थ्यकर खाद्य वस्तुएं और पेय पदार्थ खराब स्वास्थ्य के वाहक बनते हैं। व्यापार से दवाइयों, स्वास्थ्य संबंधी तकनीक और पौष्टिक आहार की उपलब्धता पर भी प्रभाव पड़ता है। उच्च स्तरीय कारक स्वास्थ्य (आर्थिक, व्यावसायिक और सामाजिक) को अधिकाधिक प्रभावित कर रहे हैं (विश्व स्वास्थ्य संगठन, 2008)। स्वास्थ्य मंत्रालयों द्वारा निर्धारित स्वास्थ्य नीति आमतौर पर उन सेवाओं तक सीमित रहती है, जिन्हें मंत्रालय संचालित करते हैं। जबकि स्वास्थ्य नीतियों में उन सभी कारकों को शामिल किया जाना चाहिए जिनसे स्वास्थ्य को प्रभावित होता है।

व्यापार जैसे पेचीदा पहलू को अलग रखकर प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले सामाजिक कारकों का निर्धारण करने वाली स्वास्थ्य प्रणाली को ही नीति में शामिल करने से यह बहुत व्यापक हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी और उनके प्रभाव के आंकलन के लिए किसी स्वास्थ्य मंत्रालय के नजरिये से डब्ल्यूएचओ ने स्वास्थ्य प्रणाली में छह प्रमुख कारकों को शामिल किया है (डब्ल्यूएचओ, 2000)। इन कारकों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा, आवश्यक स्वास्थ्य कर्मी, आवश्यक दवाइयों और तकनीकों की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं की फंडिंग का स्तर, स्वास्थ्य सूचना प्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं जाने से राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति निष्प्रभावी साबित हो सकती है।

अपूर्ण सूचीकरण अथवा उन्हें प्रभावित करने के लिए वांछित निष्कर्षों के सतही विवरण के कारण स्वास्थ्य नीतियों के दस्तावेज प्रायः निष्प्रभावी साबित होते हैं। सामाजिक स्तर पर काम करने वाले कारक जैसे पानी, स्वच्छता, खाद्य वितरण व्यवस्था, पर्यावरण, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास स्वास्थ्य और पोषण के सामाजिक तत्व हैं। व्यक्तिगत स्तर पर प्रभाव डालने वाले कारकों में आय, शिक्षा, पेशा, सामाजिक स्तर, लिंग और सामाजिक तंत्र में भागीदारी शामिल हैं। इन पर सामाजिक ताकतों का असर पड़ता है।

स्वास्थ्य पर असर डालने वाले सामाजिक कारकों में आर्थिक विकास और व्यक्तिगत आय सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। किसी देश की अर्थव्यस्था का वहां की आबादी पर दोतरफा प्रभाव पड़ता है। अर्थव्यवस्था का विकास होने से स्वास्थ्य संबंधी संकेतकों में सुधार होता है और लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होता है। जिससे उत्पादकता सुधरने से आर्थिक विकास और तेज होता है। व्यक्तिगत स्तर पर गरीबी का दोतरफा संबंध होता है। गरीब लोगों के जल्दी बीमार होने की आशंका रहती है, स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच भी सीमित होती है क्योंकि वे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते हैं। दूसरी ओर खराब स्वास्थ्य से उस व्यक्ति के गरीब होने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि बीमारी के कारण उसकी आय घटती है जबकि इलाज के खर्च का अतिरिक्त भार पड़ता है।

लोगों के स्वास्थ्य पर आर्थिक विकास अथवा सामाजिक कारकों के असर का आंकलन करते हैं तो समानता बहुत महत्वपूर्ण कारक साबित होता है। हालांकि विल्किनसन और पिकेट के अध्ययन से यह भी पता चलता है कि किसी देश में आय की असमानता से आर्थिक विकास के फायदे भी घट जाते हैं। समान प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में अगर आय असमानता ज्यादा है तो जीवन संभाव्यता कम होती है और स्वास्थ्य संकेतक खराब होते हैं। जबकि आय में असमानता कम होने पर ये समस्याएं कम होती हैं।

इसी तरह शिक्षा, पोषण, सुरक्षित पानी की उपलब्धता, स्वच्छता और क्लीन एनर्जी जैसे सामाजिक कारकों में असमानता से लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, भले ही उन्हें स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त में मिल रही हों। एक गरीब परिवार के अशिक्षित माता-पिता का अल्प पोषित बच्चे का वैसा विकास नहीं हो सकता है, जैसा विकास शिक्षित और बेहतर आर्थिक स्थिति वाले माता-पिता के बच्चे का होता है। दुखद स्थिति यह है कि गरीबी और अशिक्षा का यह दुष्प्रभाव कई पीढ़ियों तक बना रहता है। अगर गर्भवती महिला कुपोषित है, तो न सिर्फ उसके गर्भ में पल रहा बच्चा अल्प पोषित होगा, बल्कि उस बच्चे के बीजाणु के आनुवांशिक ढांचे में भी बदलाव दिखाई देगा। इसी आनुवांशिक ढांचे से तय होता है कि जन्म के बाद बच्चे का विकास कैसा होगा। इस तरह पैदा होने वाला शिशि और यहां तक गर्भ में आने वाले भ्रूण भी असमानता का शिकार बन जाता है और यह अभिशाप पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।

सभी को स्वास्थ्य सेवाएं और स्वास्थ्य सेवाओं तक सुनिश्चित समानता के सिर्फ वायदों से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं होगा और इससे समाज पर असमानता का दुष्प्रभाव दूर नहीं होगा। समानता को हम प्रायः क्षैतिज समानता के दौर पर देखा जाता है जिसके तहत सभी लोगों को उपलब्ध सेवाएं समान रूप से उपलब्ध कराने पर जोर होता है जबकि पहले से व्याप्त असमानता का प्रभाव खत्म करना है तो स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक संकेतकों पर समानता लाने और वंचित और कमजोर वर्ग के लोगों को समान स्तर पर लाने के लिए अतिरिक्त सेवाएं उपलब्ध करानी होगी। दोनों तरह की समानता के लिए सामाजिक एकजुटता आवश्यक है। पहले तो सभी को समान रूप से सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं और फिर वंचित और कमजोर वर्ग की कमियों की भरपाई के लिए कदम उठाए जाएं। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में छोटे बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगों जैसे वर्गों को सेवाएं उपलब्ध कराते समय भी इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि वंचित वर्ग को इसका विशेष फायदा मिले और सेवाएं उनके लिए वहनीय हों।

सबसे पहले स्वास्थ्य संबंधी असमानता दूर करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाए जाने चाहिए ताकि स्वस्थ समाज के विकास हो सके। समूचे समाज की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली इसी तरह से विकसित की जानी चाहिए। स्वास्थ्य नीति बनाने वालों को भी इस पर ध्यान रखना चाहिए, भले ही वे किसी खास उद्देश्य से नीति बना रहे हों। अगर स्वास्थ्य मंत्रालय स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए नीतियां बना रहे हैं, तब भी उन्हें प्रभाव डालने वाले उन कारकों पर गौर करना होगा जिनसे समाज के स्वास्थ्य के संकेतक तय होते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इस तरह का समग्र दृष्टिकोण होना चाहिए।

(के. श्रीनाथ रेड्डी पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, गुरुग्राम के अध्यक्ष हैं। लेख उनकी पुस्तक ‘मेक हेल्थ इन इंडियाः रीचिंग ए बिलियन प्लस’ के चैप्टर ‘व्हाट मेक्स ए हेल्थी सोसायटी’ के अंश पर आधारित है)