होम गाइड युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं होंगे, तब तक पोषण अभियान का मंत्र 'पुष्ट शरीर, चुस्त दिमाग' सपना ही रहेगा

युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं होंगे, तब तक पोषण अभियान का मंत्र 'पुष्ट शरीर, चुस्त दिमाग' सपना ही रहेगा

आउटलुक टीम | Nov 19, 2019

चारुपद्मा पति

भारत में कुपोषण गंभीर चिंता का विषय है। इससे देश का चहुंमुखी विकास प्रभावित हो रहा है। बड़ी संख्या में लोग स्वास्थ्यवर्धक भोजन से वंचित हैं, इस वजह से धनिक वर्ग सहित लोगों में कुपोषण की समस्या बनी हुई है। किशोरो में कुपोषण बहुत अधिक है और यह समस्या बढ़ रही है। इसका युद्ध स्तर पर समाधान निकालने की आवश्यकता है। देश की करीब आधी किशोर आबादी, 10 से 19 साल की करीब 6.3 करोड़ लड़कियां और 8.1 करोड़ लड़के या तो बहुत दुबले, नाटे, मोटे अथवा अधिक वजह के हैं।

पिछले 31 अक्टूबर को देश के शीर्ष थिंक टैंक नीति आयोग और बच्चों के लिए काम करने वाली इंटरनेशनल एजेंसी यूनीसेफ इंडिया की उच्च स्तरीय बैठक में जारी एक नई रिपोर्ट से यही तस्वीर मिलती है।

रिपोर्ट के अनुसार, 80 फीसदी से ज्यादा किशोर छिपी भुखमरी के शिकार है अथवा उनमें एक अथवा ज्यादा तरह के सूक्ष्म पौष्टिक तत्व जैसे आयरन, फोलेट, जिंक, विटामिन ए, विटामिन बी12 और विटामिन डी की कमी है।

एडोल्सेंट्स, डाइट्स, न्यूट्रीशनः ग्रोइंग वेल इन ए चेंजिंग वर्ल्ड शीर्षक वाली रिपोर्ट स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से हाल में किए गए कंप्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रीशन सर्वे (सीएनएनएस) पर आधारित है। यह सर्वे देश के प्रत्येक क्षेत्र में कुपोषण की समस्या को समझने और उसके लिए समाधान प्रस्तावित करने के लिए किया गया था।

सीएनएनएस के आंकड़े किशोरावस्था के लड़के और लड़कियों दोनों में सभी प्रकार के सूक्ष्म पौष्टिक तत्व, इनकी कमी, खानपान की आदतें और उनके जीवन कौशल व्यवहार के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इस रिपोर्ट में किशोरों के विकास के लिए आवश्यक सेवाओं जैसे स्कूल, स्वास्थ्य और पोषण की उपलब्धता के बारे में जानकारी देती है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के अधिकांश किशोरों को अस्वास्थ्यवर्धक अथवा अपर्याप्त आहार मिलता है। उनमें कुपोषण का मुख्य कारण यही है।

प्रमुख निष्कर्ष

देश के युवाओं में पौष्टिक तत्वों की स्थिति के बारे में चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत करती है।

आय बढ़ने के साथ ही दोहरी समस्या भी पैदा हुआ है। फ्राइड फूड्स, एरेटेड ड्रिंक्स, जंक फूड और मिठाइयों का सेवन एक साथ बढ़ा है। इससे देश के हर राज्य में डायबिटीज और हार्ट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ा है।

समस्या का समाधान

पहली बार, सीएनएनएस के आंकड़ों ने प्रमाण दिए हैं जिनकी वजह से सभी किशोरों को दायरे में लेते हुए उनके पोषण की व्यापक असरकारी योजनाएं लागू करना आव‍श्यक हो गया है। मुख्य समाधान ये हैं

- किशोरियां माता बनें, उससे पहले उन पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। कुपोषण का पीढ़ी दर पीढ़ी चक्र रोकने के लिए कदम उठाना बहुत जरूरी है। इस कुचक्र से भारत पर लंबे समय से असर पड़ रहा है। पोषण अभियान (राष्ट्रीय पौषक मिशन) का मुख्य उद्देश्य किशोरियों में एनीमिया हर साल तीन फीसदी घटाना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि समुदाय और स्कूल स्तर के कार्यक्रमों की पहुंच उन सभी तक हो, जिन्हें इसकी आवश्यकता है।

- सीएनएनएस महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के बारे में जानकारी देता है जो स्कूल आधारित सेवाओं पर काम करते हैं। अच्छे पोषण (आहार, सेवा और व्यवहार) के लिए स्कूल अच्छे प्लेटफार्म हैं। खासकर शुरुआती किशोरों 10 से 14 साल के) के लिए यह सबसे अच्छा प्लेटफार्म है क्योंकि 85 फीसदी बच्चे स्कूल में दाखिल किए जाते हैं।

- रिपोर्ट के अनुसार करीब 25 फीसदी किशोर लड़कों और लड़कियों को मिड डे मील, द्विवार्षिक स्वास्थ्य जांच, द्विवार्षिक डिवॉर्मिंग (कृमिहरण) और साप्ताहिक आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन नहीं मिलता है। इस समस्या का समाधान निकालना अनिवार्य है क्योंकि इससे युवा वयस्कों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।

- रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि घरों में पौष्टिक भोजन और स्नैक्स अपनाए जाने चाहिए। स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पसंद को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रमों का फोकस इस पर होना चाहिए कि विभिन्न तरह के फूड आयटम पर्याप्त मात्रा में लोगों के घरों में उपलब्ध हों।

- असंचारी बीमारियों का जोखिम बचपन और किशोरावस्था में ही बस जाता है। उदाहरण के लिए डायबिटीज, हाइपरटेंशन और कई तरह की हार्ट की बीमारियों जैसे गंभीर बीमारियों का खतरा किशोरों में बढ़ रहा है। इसलिए यह आवश्यक है कि 10 से 19 साल के किशोरों पर अतिरिक्त ध्यान दिया जाए और उन्हें समुचित पोषण दिया जाए क्योंकि इस अवस्था के पोषण स्तर से ही उनके बाकी जीवन का स्वास्थ्य निर्भर होता है।

- सभी लड़कियां और लड़के रोजाना 60 मिनट तक बाहरी खेलकूद और व्यायाम की सलाह पूरी नहीं करते हैं। पता चलता है कि अधिक उम्र की लड़कियां रोजाना मुश्किल से 10 मिनट इस तरह की गतिविधियां करती हैं। इस मामले में लड़के बेहतर स्थिति में हैं। वे रोजाना 40-50 मिनट व्यायाम और खेलकूद में गुजारते हैं।

- रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि खुद किशोरों को स्कूल और दूसरे मंचों पर जहां वे जाते हैं, पोषण का संदेश पहुंचाने के लिए संदेशवाहक के तौर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि कुपोषण को खत्म करने के लिए देश में जन आंदोलन खड़ा किया जा सके।

पोषण अभियान अब अपने दूसरे वर्ष में है और यह सही समय है जब देश की भावी माताओं और पिताओं के लिए पोषण कार्यक्रम मजबूत किए जाएं ताकि कुपोषण का पीढ़ी दर पीढ़ी कुचक्र रोका जा सके।

भारत में किशोरों के आहार और पोषण पर यह पहला राष्ट्रीय विश्लेषण है।