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स्वस्थ किडनी के लिए आपका आहारः क्या खाने से मिलेगा फायदा

| Dec 10, 2019

स्वस्थ जीवन जीने के लिए आपकी किडनी आपके दिल की तरह ही महत्वपूर्ण है। इन दोनों अंगों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ खास टिप्स

बिपाशा दास

किडनी यानी गुर्दे हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं जो रक्त और अन्य तरल उत्सर्जन के लिए फिल्टर का काम करते हैं। कमर के ठीक ऊपर सेम के आकार के ये दो अंग हमारे पूरेशरीर के केमिकल होमियोस्टेसिस को दुरुस्त रखने का काम करते हैं। इन अंगों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ आवश्यक जानकारियां इस प्रकार हैं।

किडनी की समस्याएं इन टेस्टों के माध्यम से पता लगाई जा सकती हैं।

- ब्लड टेस्ट

- यूरीन टेस्ट

- किडनी स्कैन

- किडनी बायप्सी

- किडनी एक्स (रे- पल्मोनरी एडिमा की जांच के लिए-फेफड़ों में तरल का जमाव)

- ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (जीएफआर- यह टेस्ट ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट मापने के लिए होता है। इसमें मरीज के रक्त और मूत्र में अपशिष्ट तत्वों के स्तर की तुलना होती है। जीएफआर में माप होती है कि किडनी एक मिनट में कितने मिलीलीटर अपशिष्ट तरल को फिल्टर कर सकती है।)

किडनी की समस्याओं के लक्षण

किडनी से संबंधित बीमारियों के प्रायः दिखने वाले संकेत और लक्षण इस तरह हैं

- एनीमिया

- मूत्र में रक्त आना

- पेशाब का गहरा रंग होना

- मानसिक चुस्ती कम होना

- पेशाब कम आना

- एडिमा- पैर, हाथ और एड़ी में सूजना (समस्या गंभीर होने पर चेहरे पर सूजनन)

- थकान

- हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप)

- अनिद्रा

- त्वजा में खुजली, बार-बार हो सकती है

- भूख न लगना

- पुरुषों में यौन संबंध के लिए उत्तेजना प्राप्त न कर पाना (इरेक्टाइल डायफंक्शन)

- जल्दी-जल्दी पेशान आना, खासकर रात में

- मांसपेशियों में जकड़न

- मासपेशियों में एठन

- उबकाई आना

- निचली कमर में एक ओर या बीच में दर्द होना

- सांस फूलना

- पेशान में प्रोटीन

- शरीर के वजन में अनायास बदलाव

- अकारण सिरदर्द

किडनी से संबंधित बीमारियों के प्रकार

1- ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस

2- नेफ्रोसिस

3- एक्यूट रेनल फेल्योर

4- क्रोनिक रेनल फेल्योर

5- रेनल ट्रांसप्लांट

6- किडना स्टोन अथवा यूनीनरी केलसुली

किडनी की बीमारी से बचने के लिए आहार में बदलाव

रेनल डाइट यानी गुर्दों के स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त आहार में सोडियम, फॉस्फोरस और प्रोटीम कम होता है। इसकी डाइट में हाई क्वालिटी प्रोटीन का उपयोग किया जाता है और आमतौर पर तरल पदार्थ घटाया जाता है। कुछ मरीजों को पोटेशियन और कैल्शियम भी कम करना पड़ सकता है। हर व्यक्ति का शरीर अलग तरह का होता है। रेनल डिजीज यानी गुर्दे की बीमारी के प्रकार और अवस्था के अनुसार आहार और न्यूट्रीशन की आश्यकता बदल जाती है।

प्रोटीन

इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को आसानी से पचने योग्य उच्च क्वालिटी का प्रोटीन लेने की सलाह दी जाती है। मरीज की स्थिति और बीमारी की अवस्था के अनुसार मात्रा कम-ज्यादा हो सकती है। अगर पर्याप्त कैलोरी दी जाती है तो रोजाना न्यूनतम 0.6 ग्राम प्रति किलो बायोलॉजिकल वैल्यू प्रोटीन के साथ स्थिर नॉनएसिडोटिक मरीजों में नॉनडायलिसिस स्थिति में न्यूट्रल नाइट्रोजन बैलेंस प्राप्त किया जा सकता है।

गुर्दे के अनुकूल प्रोटीन स्रोत

चिकन

पनीर

एग ऑमलेट

एग का सफेद हिस्सा

मछली

दही

फॉस्फोरस

नेशनल किडनी फाउंडेशन की सिफारिश है कि सॉफ्ट टिश्यू कैल्सिफिकेशन (टिश्यू में जकड़न) रोकने के लिए सीरम कैल्शियम फॉस्फोरस प्रोडक्ट 55 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर रखना चाहिए। फॉस्फोरस बाइंडर्स से कैल्शियम को 1500 मिलीग्राम प्रति दिन से कम रखना चाहिए और कुल कैल्शियम सेवन (सप्लीमेंट और आहार मिलाकर) 2000 मिलीग्राम प्रति डिसीलीटर से अधिक नहीं होना चाहिए।

फॉस्फोरस कई तरह की खाद्य वस्तुओं में मिल सकता है। इसलिए किडनी की समस्या से परेशान मरीजों को फॉस्फोरस का स्तर दुरुस्त रखने के लिए रेनल डायटीशियन की मदद लेनी चाहिए।

कम फॉस्फोरस आहार की प्रमुख वस्तुएं

इटैलियन, फ्रेंच और सोरडो ब्रेड

मक्का या चावल और गेहूं की क्रीम

फीके पॉपकॉर्न

हल्के रंग के कुछ सोडा और लेमोनेड

अत्यधिक फॉस्फोरस वाली इन खाद्य वस्तुओं से बचें

होल ग्रेन ब्रेड

ब्रान सीरियल्स और ओटमील

नट और सनफ्लॉवर सीड

गहरे रंग के कोला

सोडियम

आमतौर पर किडन के गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्तियों के भोजन में सोडियम की मात्रा 2000-4000 मिलीग्राम प्रति दिन पर सीमित रखी जाती है। जिससे हाइपरटेंशन, अत्यधिक प्यास से बचा जा सके और अल्पमूत्रता वाले मरीजों में तरल उपभोग सीमित रखा जा सके। साल्ट सब्स्टीट्यूट में आमतौर पर पोटेशियम क्लोराइड होता है। मरीजों को इन्हें लेने से मना किया जाता है क्योंकि इनसे हाइपरकेलेमया (रक्त में पोटेशियम की अधिकता) हो सकती है। गंभीर अवस्था में गुर्दे की बीमारी वाले नॉनडायोलाइज्ड अधिकांश मरीजों को 1000-3000 मिलीग्राम सोडियम और 1500-3000 एमएल फ्यूड दिए जाने से सोडियम और पानी का बैलेंस सही रहता है। सोडियम और पानी की आवश्यकता अलग-अलग होती है। प्रत्येक मरीज के लिए अलग-अलग ध्यान दे होता है।

गुर्दे की बीमारी से पीड़ित मरीजों को अत्यधिक सोडियम मिलने से नुकसान हो सकता है क्योंकि उनके गुर्दे अधिक सोडियम और पानी को शरीर से निकालने में नाकाम रहते हैं। सोडियम और फ्यूज टिश्यू और ब्लड स्ट्रीम में जम जाता है, इससे ये समस्याएं हो सकती हैं।

- अत्यधिक प्यास

- एडिमा- टांगों, हाथ और चेहरे पर सूजन

- उच्च रक्त चाप

- हृदय रोग- ब्लड स्ट्रीम में अत्यधिक फ्लूड हो से आपके दिल को अतिरिक्त प्रयास करना होता है। इससे दिल बड़ा और कमजोर हो जाता है

- सांस लेने में परेशानी- फेफड़ों में फ्लूड जम जाता है, इससे सांस लेने में दिक्कत होती है

मरीज सोडियम की मात्रा की कैसे निगरानी कर सकते हैं

- खाद्य वस्तुओं के लेबल्स को हमेशा पढ़े। सोडियम है तो उस पर सूचीबद्ध होगा

- खाने के लिए परोसी जाने वाली मात्रा पर ध्यान दें

- ताजे मीट का इस्तेमाल करें

- ताजे फल और सब्जियों का उपयोग करें

- प्रोसेस्ड और केन या टिन में पैक्ड फूड से बचें

- ब्रांडों की तुलना करें और न्यूनतम सोडियम वाले ब्रांड अपनाएं

- उन मसालों का इस्तेमाल करें जिनके नाम में साल्ट न हो (गारलिक साल्ट के बजाय गारलिक पाउडर को चुनें)

पोटेशियम

जिन मरीजों को हेमोडायलिसिस की आवश्यकता है, उन्हें आहार में अधिकतम 2000-3000 मिलीग्राम रोजाना पोटेशियम लेना होता है। पेरिटोनियल डायलिसिस के जरूरतमंद मरीजों के लिए अधिकतम मात्रा 3000-4000 मिलीग्राम रहती है।

गुर्दे के मरीजों को आहार में पोटेशियम की मात्रा पर क्यों ध्यान देना चाहिए।

जब गुर्दे खराब हो जाते हं तो वे अत्यधिक पोटेशियम को निकालने में सक्षम नहीं रहते हैं। इससे शरीर में पोटेशियम बढ़ने लगता है। रक्त में अधिक पोटेशियम होने से हाइपरकेलेमिया की बीमारी हो जाती है। इससे ये परेशानियां हो सकती है।

- मांसपेशियों में कमजोरी

- अनियमित हृदय गति

- धीमी नाड़ी

- हार्ट अटैक

- मौत

मरीज आहार में पोटेशियम की मात्रा की निगरानी कैसे कर सकते हैं।

जब गुर्दे पोटेशियम को नियमित नहीं कर पाते हैं तो मरीजों को भोजन में पोटेशियम की मात्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि आपके रक्त में पोटेशियम की मात्रा सुरक्षित सीमा में रहे। इसके लिए आपको ये उपाय करने होंगे।

1- अत्यधिक पोटेशियम वाला भोजन कम करें

2- दूध और इसके उत्पाद की दैनिक 8 औंस (227 ग्राम) से अधिक न हो

3- खट्टे (सिट्रस) फल और सब्जियां चुनें

4- साल्ट सब्सीट्यूट और पोटेशियम वाली चटनी से बचें

5- पैकेज्ड फूड के लेबल पढ़ें और पोटेशियम क्लोराइड से बचें

6- परोसे जाने वाले भोजन की मात्रा पर ध्यान रखें

फ्लूड्स

गुर्दे की गंभीर अवस्था वाली बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए फ्यूड पर कंट्रोल करना महत्वपूर्ण होता है क्योंकि फ्लूड का सेवन करने से शरीर में फ्लूड बढ़ सकता है जो खतरनाक हो सकता है। डायलिसिस वाले मरीजों में पेशाब कम आने लगता है। इससे शरीर में फ्लूड बढ़ने से दिल और फेफड़ों पर अनावश्यक दबाव बढ़ जाता है।

फ्लूड को नियंत्रण करने के लिए ये उपाय करने चाहिए

- डॉक्टर की सलाह से ज्यादा न पिएं

- कमरे के तापमान वाला भोजन करना चाहिए

- खाना पकाने में भी पानी की मात्रा कम की जाए

किडनी स्टोन

किडनी स्टोन सख्त ढेले की तरह होता है जो पेशान में क्रिस्टल से बन जाता है

स्टोन बनने से रोकने के लिए आहार में बदलाव की सलाह दी जाती है

1- खूब पानी पीना अच्छा- रोजाना 2-3 लीटर

- इसमें सभी तरह का फ्लूड यानी तरल पदार्थ शामिल होता है जैसे पानी, कॉफी और शर्बत। शर्बत फायदेमंद माना जाता है खासकर अंगूर का जूस और सोडा।

- इससे कम संक्रेंद्रित पेशाब पैदा करने में मदद मिलती है और अच्छी मात्रा (कम से कम 2.5 लीटर प्रति दिन) में पेशाब होना सुश्चित होता है।

2- हाई ऑक्सेलेट वाले खाद्य पदार्थ कम करें

- पालक, तरह-तरह क बेरी, चॉकलेट, गेहूं भूसी, नट्स, बीट्स, चाय और रूबर्ब (एक तरह का फल) को अपने भोजन से निकाल दीजिए।

3- भोजन में पर्याप्त कैल्शियम लीजिए

- दिन में तीन बार डेयरी उत्पाद लेने से कैल्शियम स्टोन बनने का खतरा कम रहता है।

4- अतिरिक्त कैल्शियम सप्लीमेंट लेने से बचें

- कैल्शियम सप्लीमेंट तभी लेना चाहिए जब आपका फिजीशियन या किडनी डायटीशियन सलाह दे।

5- प्रोटीन कम मात्रा में भोजन में लें

- ज्यादा प्रोटीन लेने से गुर्दे ज्यादा कैल्शयम पैदा करेंगे। इससे किडनी में ज्यादा स्टोन बनने लगेंगे।

6- ज्यादा नमक खाने से बचें

- सोडियम ज्यादा लेने से पेशाब में कैल्शियम बढ़ता है जिससे स्टोन बनने की आशंका बढ़ जाती है।

- ब्लड प्रेशर को नियंत्रण रखने के लिए भोजन में कम नमक लेना महत्वपूर्ण है।

7- विटामिन सी सप्लीमेंट की अधिक खुराक न लें

- यूएस डायटरी रेफरेंस इनटेक के आधार पर रोजाना 60 मिलीग्राम तक विटामिन सी लेने की सलाह दी जाती है।

- प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम या इससे ज्यादा मात्रा शरीर में ओक्सेलेट बढ़ाती है।

(डायटीशियन तथा हेल्थ कोच बिपाशा दास मल्टी-स्पेशिएलिटी हॉस्पीटल्स और कंपनियों के अलावा कम्युनिटी न्यूट्रीशन कैंप में काम कर चुकी हैं। वे मॉडर्न अर्बन लाइफस्टाइल और डाइट प्लानिंग की विशेषज्ञ हैं)