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“बच्चों को अच्छा भोजन और शिक्षा मिले तो अलग तरह का होगा हमारा देश”

आउटलुक टीम | Dec 30, 2019

अक्षय पात्र फाउंडेशन के पौष्टिक और संतुलित मिड-डे मील से बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरणा

लोला नायर

अक्षय पात्र फाउंडेशन पिछले दो दशकों से देश भर में लाखों बच्चों के लिए स्वाद और स्वास्थ्य के फायदे खोए बगैर मिड-डे मील को आनंदपूर्ण और पौष्टिक अनुभव बना रहा है। फाउंडेशन के वाइस चेयरमैन चंचलपति दास ने अपने एनजीओ के प्रयास साझा किए।

प्रश्नः अक्षय पात्र फाउंडेशन दिल्ली में रोजाना 66,000 बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय करन रहा है। आप पूरे देश में कितने बच्चों को भोजन करवा रहे हैं और आपके प्रयासों के नतीजे कैसे रहे हैं?

उत्तरः हर पूरे देश में रोजाना करीब 18.7 लाख बच्चों को भोजन करवा रहे हैं। हम पिछले 20 वर्षों से सरकार के मिड-डे मील कार्यक्रम में हिस्सेदारी कर रहे हैं। अक्षय पात्र के मिड-डे मील कार्यक्रम का पहला और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य क्लासरूम में छात्रों की भूख मिटाना है। सरकार बुनियादी सुविधाओं, अध्यापकों के वेतन, यूनीफॉर्म, पुस्तकों और अन्य मदों पर करोड़ रुपये खर्च करती है। अगर कोई छात्र क्लासरूम में भूखा है तो वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाएगा। इसलिए भोजन उपलब्ध कराना आवश्यक है। सरकार शिक्षा पर जो निवेश कर रही है, उसके अतिरिक्त भोजन पर यह खर्च किसी बच्चों के लिए ज्यादा उपयोगी साबित होगा। इसलिए हम समूचे सिस्टम में इसे रणनीतिक कार्यक्रम मानते हैं। क्लासरूम की भूख को मिटाकर हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि बच्चों के लिए पढ़ाई और ज्यादा सार्थक बने।

एक अन्य पहले अहम है। कई अध्ययनों और सर्वे से पता चलता है कि मिड-डे मील से बच्चे को स्कूल भेजना किसी परिवार के लिए प्रोत्साहन देने वाला होता है। यह लड़कियों के मामले में ज्यादा सटीक है क्योंकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजने वाले गरीब परिवार आमतौर पर सोचते हैं कि लड़की अपने छोटे भाई-बहनों का ख्याल रखेगी। उनके लिए लड़कियों के लिए शिक्षा दिलाना बेकार होता है। लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि स्कूल में भोजन मिल रहा है तो परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने को प्रोत्साहित होते हैं। हमने देखा है कि जब माता-पिता को भोजन मिलने की जानकारी मिलने पर स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या और क्लास में उपस्थिति बढ़ी है और उच्चतर शिक्षा में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या कम हुई है। यह स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहन का काम करता है।

हम सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं, इसलिए यह पब्ल्कि-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोग्राम है। पूरे देश के 12 जिलों में 52 स्थानों पर हमारा नेटवर्क 18.7 लाख बच्चों को भोजन मुहैया कराता है। हमने देश में पौष्टिकता समर्थन कार्यक्रम का नेटवर्क तैयार किया है। सिस्टम और संगठन के चलते हम पौष्टिकता अथवा किसी अन्य प्रकार का सुधार कुछ हफ्तों में ही लागू करते हैं और हम 18 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुंच बनाने में सक्षम हैं। यह हमारे कार्यक्रम एक अन्य महत्वपूर्ण ताकत है। शुरू में यह कार्यक्रम भुखमरी मिटाने के लिए था लेकिन अब यह पौष्टिकता पूरक कार्यक्रम बन गया है।

स्कूली बच्चे मिड-डे मील का आनंद उठाते हुए

प्रश्नः क्या आपने अपने कार्यक्रम का पौष्टिकता सुधार आंकलन करवाया है?

उत्तरः हमने पौष्टिकता सुधार आंकलन न सिर्फ अपने स्तर पर किया है, बल्कि बाहर के संगठनों, मेडिकल कॉलेजों के सामुदायिक चिकित्सा विभाग अन्य माध्यमों से करवाया है। इन सभी अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि भोजन मिलने के छह महीने के भीतर बच्चे को पौष्टिकता का फायदा मिला है। बच्चों को शिक्षित करना है। देश में गरीबी खत्म करने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावशाली साधन है। इसलिए अगर बच्चों को भोजन और शिक्षा मिले तो हमारा देश अलग तरह का होगा।

प्रश्नः पिछले 20 वर्षों में भोजन को और पौष्टिक बनाने के लिए आपने उसमें क्या बदलाव किए है?

उत्तरः हमारा कार्यक्रम समय के साथ विकसित हुआ है। शुरू में हम समझते थे कि यह कार्यक्रम बच्चों का पेट भरने के लिए है। लेकिन अब हम इसके लिए सतर्क रहते हैं कि बच्चों को निश्चित मात्रा में रोजाना कैलोरी मिले। भोजन के माध्यम से निश्चित मात्रा में प्रोटीन देना है। यही नहीं, सूक्ष्म पौष्टिक तत्व जैसे फोलिक एसिड, आयोडीन (इसके लिए आयोडाइज्ड नमक) आदि भी निश्चित मात्रा में भोजन के जरिय देने की जरूरत है। हमारे देश में आयोजीन और विटामिन डी की कमी बहुत ज्यादा है। हम इन कमियों को दूर करने का काम करते हैं। इसके लिए हम सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों को पर्याप्त मात्रा में सब्जियां और दालें इत्यादि मिलें। इसलिए भोजन न सिर्फ पौष्टिक होना चाहिए, बल्कि जैव सुलभता भी होनी चाहिए। अगर भोजन में कुछ खास तरह की वस्तुएं और सामग्री मौजूद हैं तो शरीह में इन सूक्ष्म पौष्टिक तत्वों और पौष्टिकता ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। हम सुनिश्चित करते हैं कि जीरा, नींबू और अदरक जैसी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाए, इनसे शरीर में सूक्ष्म पौष्टिक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है। हम न सिर्फ कैलोरी, प्रोटीन और सूक्ष्म पौष्टिक तत्वों पर ध्यान देते हैं, बल्कि जैव सुलभता का भी ख्याल रखते हैं।

हमने देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ पायलट प्रोग्राम चलाए हैं, जहां हमने मिलेट (बाजरा, ज्वार इत्यादि) का इस्तेमाल शुरू किया है क्योंकि पौष्टिकता के लिहाज से ये बेहतरीन होते हैं। मिलेट का इस्तेमाल करना किसानों के लिए भी अच्छा है क्योंकि इनकी पैदावार ज्यादा रहती है। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थानों पर अन्य अनाज नहीं उगाए जाते हैं, वहां कम पानी की खपत के कारण मिलेट यानी मोटे अनाज ही पैदा किए जाते हैं। मिलेट हमारी धरती के लिए बहुत ही पर्यावरण अनुकूल हैं। इसकी उपयोगिता को देखते हुए हमने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को मिड-डे मील में मिलेट को शामिल करने की सिफारिश की है। हमने इस कार्यक्रम में दुग्ध उत्पादों को भी शामिल करने की सरकार से सिफारिश की है। दुग्ध उत्पाद बच्चों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनसे बच्चों को कैल्शियम और अन्य पौष्टिक तत्व मिलते हैं। हम केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस कार्यक्रम को विस्तार देने पर काम कर रहे हैं ताकि देश के बच्चों को इसका लाभ मिल सके और भविष्य में हम अलग तरह का देश बन सकें।

प्रश्नः क्या अलग-अलग राज्यों के लिए मिड-डे मील के अलग-अलग मेन्यू हैं?

उत्तरः क्षेत्रीय पसंद के अनुसार विभिन्न राज्यों में हमारे मिड-डे मील कार्यक्रम के अलग-अलग मेन्यू हैं। हम बच्चों की सांस्कृतिक पसंदों का सम्मान करते हैं। उदाहरण के लिए, गुजरात में हम गुजराती भोजन देते हैं जबकि आंध्र प्रदेश में वहां का स्थानीय भोजन मुहैया कराते हैं। लेकिन हर राज्य में संतुलित भोजन देने पर ध्यान रखते हैं। हमारे यहां एक अच्छी बात है कि पारंपरिक रूप से स्थानीय स्तर पर जो पसंद किया जाता है, वह अच्छा भोजन है और वह बच्चे की पौष्टिक आवश्यकताएं पूरी करता है। इसलिए हम इस पर ध्यान रखते हैं। हालांकि हम बच्चों की जन्मजात पसंद को पूरा करने की कोशिश करते है। यही वजह है कि हम पिछले दो दशकों से बच्चों को मिड-डे मील परोस रहे हैं।

उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू अक्षय पात्र फाउंडेशन के वाइस चेयरमैन चंचलपति दास को आउटलुक पोषण अवार्ड 2019 प्रदान करते हुए। आउटलुक पब्लिशिंग के सीईओ इंदनील रॉय और आउटलुक मैगजीन के एडिटर-इन-चीफ रूबेन बनर्जी भी उनके साथ हैं