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मोटे अनाज के लिए भुवनेश्वर के संगठन की अनूठी पहल, घर के पिछवाड़े में खेती का प्रयोग

आउटलुक टीम | Dec 07, 2019

नारायणी राजश्री कानूनगो

न्यू्ट्रीशन से भरपूर और पर्यावरण अनुकूल मिलेट यानी जौ, बाजरा, ज्वार जैसे मोटे अनाज ओडिशा के कृषि क्षेत्र खासकर शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्र की प्रमुख फसलों में से हैं। ये अनाज आदिवासी और तटीय ओडिशा के लोगों का पारंपरिक भोजन है। सिंचाई की सुविधाओं (अथवा उनकी कमी) से जुड़ी सामाजिक दिक्कतों, जलवायु परिवर्तन और वहां के लोगों में कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए ओडिशा सरकार ने इन अनाजों के उत्पादन को मिशन मोड में प्रोत्साहन देने की पहल की है। सरकार ने ओडिशा मिलेट्स मिशन (ओएमएम) के तहत आदिवासी क्षेत्र के 14 जिलों में मोटे अनाजों को आम लोगों की थाली में पहंुचाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया है।

मोटे अनाजों के बारे में जागरूकता के लिए चार क्षेत्रों जैविक रूप से पैदावार, विधिपूर्वक प्रक्रिया, रणनीतिक विपणन और सावधानी के साथ खपत पर ध्यान दिया गया है। इसके अतिरिक्त मलकानगिरि जिले में फ्लैगशिप प्रोग्राम स्पेशल प्रोग्राम फॉर प्रमोशन ऑफ इंटीग्रेटेड फार्मिंग इन ट्राइबल ओडिशा लांच किया गया है। इन दोनों कार्यक्रमों का उद्देश्य राज्य के लोगों के विविध आहार में मोटे अनाजों को शामिल करना और पोषण सुरक्षा बढ़ाने के लिए जैविक आहार पर जोर देना है।

अलग तरह की प्रयोगशाला

ओडिशा मिलेट्स मिशन एक खास तरह के ढांचे में उभरा है जिसमें सरकार, सिविल सोसायटी और एकेडमिक्स एक मंच पर आए हैं। ओडिशा के कृषि विभाग के बैनर तले नवकृष्ण चौधरी सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज (एनसीडीएस) को राज्य सचिवालय बनाया गया और इसमें दो िवंग विश्लेषण एवं अनुसंधान के लिए रिसर्च सचिवालय और अनुपालन के लिए एनजीओ वासन द्वारा प्रोग्राम सचिवालय बनाया गया।

राज्य सचिवालय में रिसर्च और प्रोग्राम विंग के बीच लगातार होने वाले विचार िवमर्श से प्रयोगों के लिए प्रायः नए क्षेत्र खुलते हैं। इससे जैविक खेती को प्रोत्साहन से लेकर मोटे अनाज को दैनिक भोजन में शामिल करने तक के मसलों पर चर्चा होती है। इंटरेक्टिव स्पेस फॉर लर्निंग और संस्थान के पिछवाड़े में बाग बनाने जैसे विचार इन्हीं चर्चाओं से मिले।

ओएमएम के अनुसंधानकर्ताओं द्वारा की गई अनूठी अकामदमिक पहल इंटरेक्विट स्पेस फॉर लर्निंग इस तरह तैयार की गई है कि नीतिनिर्धारक, नीतियां लागू कने वाले, सिविल सोसायटी के संगठन, अनुसंधानकर्ता और एग्रो इकोलॉजिकल प्रैक्टिस, हेल्थ, न्यूट्रीशन और संबंधिक क्षेत्रों में लगे अन्य पक्षों को आपस में चर्चा करने का अवसर मिले जिससे एक प्रयोगशाला के तौर पर यह पहल जैविक समग्र खेती और मोटे अनाज की खेती को मदद कर सके। इस तरह की पहल का मकसद है आंतरिक अनुसंधानकर्ताओं का इस्तेमाल दोनों कार्यक्रमों की प्रक्रिया और नतीजों के लिए बेहतर इस्तेमाल किया जाए। बेकार पड़े जमीन के एक टुकड़े को खेत के रूप में विकसित किया गया और वहां पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों और कृषि विशेषज्ञों और जैविक कृषि करने वालों से प्राप्त नई तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल करके प्रयोग के तौर पर सब्जियां और मोटे अनाज उगाए जा रहे हैं। इसके मुख्य उद्देश्य कुछ इस प्रकार हैं।

नीतिनिर्धारकों और लागू करने वालों, सिविल सोयायटी, अनुसंधानकर्ताओं और अन्य पक्षों को एकसाथ लाकर बहुउद्देश्यीय दृष्टिकोण अपनाकर समग्र जैविक खेती और मोटे अनाज उगाने को प्रोत्साहन देने के लिए एक अनूठी अकादमिक पहल और अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।

एग्रो इकोलॉजिकल प्रैक्टिस, हेल्थ, न्यूट्रीशन और संबंधित क्षेत्रों में लगे अनुसंधानकर्ताओं को साथ लाकर कृषि आर्थिक गतिविधियों के प्रयोक के लिए फिजिकल लैबोरेटरी स्थापित करना।

शहरी क्षेत्रों में घरेलू स्तर पर श्रम और कुशलता का इस्तेमाल करके जैविक कृषि गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए अभ्यास प्रदान करना।

घरेलू स्टाफ को घर से शुरुआत के दृष्टिकोण के साथ उदाहरण के तौर पर पौष्टिक और गैर विषाक्त खाद्य उत्पाद मुहैया कराना

लर्निंग स्पेस

खेती की आधुनिक तकनीक में उत्पादकता बढ़ाने और फसलों को कीटों से बचाने के लिए कई वर्गों में कई तर्क दिए जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप केमिकल फर्टिलाइजर और सिंथेटिक पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा। हालांकि अनुसंधान से पता चलता है कि इससे जमीन की उत्पादकता पर दीर्घकाल में प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके अलावा इससे स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्याएं भी होती हैं। हाल के वर्षों में एक नया नजरिया उभरा है कि भोजन में जहर घोलने के बजाय जैविक खेती की शुरुआत की जाए और मल्टीक्रॉप, इंटरक्रॉप और अन्य वैज्ञानिक विधियों से उत्पादन बढ़ाने के वैकल्पिक तरीके अपनाए जाएं। इसके संबंध में कई सकारात्मक प्रयास और कार्यक्रम चलाए शुरू किए जा रहे हैं।

इसी दृष्टिकोण के अनुरूप कुछ समय पहले सिविल सोसायटी संगठन निर्माण द्वारा राज्य स्तरीय सिंपोजियम सेफ एंड न्यूट्रीशियस फूड का आयोजन किया गया। इस कार्यक्राम से एनसीडीएस भी जुड़ा था। पौष्टिक आहार के लिए न्यूट्रीशन गार्डन बनाने और खुद का भोजन उगाने पर जोर दिया गया और कृषि, आहार और पौष्टिकता के बीच में लिंकेज विकसित किया जाए। कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले अनेक लोगों ने अपने शहरी घरों में इस तरह की पहल का अनुभव करने में दिलचस्पी दिखाई। कार्यक्रम में विशेषज्ञ के तौर पर हिस्सा लेने वाले ऑर्गनिक फार्मिंग के सलाहकार और किचन गार्डन एसोसिएशन के मैनेजिंग ट्रस्टी महेश्वर खिल्लर ने राज्य में उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए एनसीडीएस से अपने पिछवाड़े में एक्सपेरीमेंटल न्यूट्रीशन गार्डन विकसित करने का अनुरोध किया।

इससे ओएमएम में लगे एनसीडीएस के अनुसंधानकर्ताओं और इंटीग्रेटेड फार्मिंग प्रोग्राम के बीच इस मामले में ठोस सुझाव देने के लिए गहरा से विचार विमर्श हुआ। एनसीडीएस के डायरेक्टर प्रो. श्रीजीत मिश्रा ने कहा कि अगर भोजन का स्रोत ही विषाक्त होगा तो पौष्टिकता के लिए उपभोग पर ध्यान देना अर्थहीन हो जाएगा।

एससीडीएस के रिसर्च ऑफीसर आर. पी. मोहंती ने लर्निंग स्पेस तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई और इस उद्देश्य के लिए योगदान करने के लिए कई जानकारों को जोड़ा। जैविक खेती में खास रुचि रखने वाले मोहंती ने इंस्टीट्यूट के स्टाफ के समर्थन से प्रोजेक्ट का प्रबंधन किया।

एनडीओ वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एंड एक्टिविटीज नेटवर्क यानी वासन के सुशाल चौधरी ने छोटे से स्थान पर कई वैरायटी के मोटे अनाज उगाने का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा कि यह गलतियों से सीखने का तरीका ज्यादा है। हम प्रत्येक कटाई से सीख रहे हैं। अभी तक एक कटाई पूरी हुई जिसके नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं।

अंतिम शब्द

एक साल की इस पहल ने 10000 वर्ग फुट के जैविक कृषि के खेत और बागान विकसित किए हैं। करीब 22 किस्मों की हरी सब्जियां उगाई जा रही हैं और स्टाफ को रोजाना बेची जा रही हैं। इससे होने वाली आय को गार्डन के रखरखाव और इस इकाइयों को आत्मनिर्भर बनाने पर खर्च किया जा रहा है। स्थापित प्रणाली और कई नए प्रयोगों से मोटे अनाजों की 15 से ज्यादा घरेलू किस्में उगाई गई हैं। पहली फसल की कटाई भी पूरी हो चुकी है और वैज्ञानिकों द्वारा नतीजों का विश्लेषण किया जा रहा है। जैविक खाद और कंपोस्ट खाद, जैविक कीटनाशक तैयार किए जा रहे हैं। इनका इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में किया जा रहा है। इंस्टीट्यूट में आने वाले लोग प्रायः यहां के गार्डन से ताजी हरी सब्जियां ले जाते हैं। यह इस परियोजना की सफलता है। लर्निंग स्पेस का उद्देश्य शहरों में लोगों को प्रेरित करना है।

इस पहल से उम्मीद है कि इसका संदेश आसपास के क्षेत्रों में जाएगा और नीतिनिर्धारक भी ध्या देंगे कि शिक्षण संस्थानों और अन्य संस्थानों में में इसी तरह के प्रयोग किए जाएं और खेत से थाली तक खाद्य वस्तुएं पहुंचाने के प्रयोगों को प्रोत्साहित किया जाए। शहर, कस्बे और गांवों में खाली स्थानों को जैविक कृषि के खेतों में तब्दील करना क्या खूबसूरत प्रयोग नहीं होगा। ताकि जैविक भोजन और मोटे अनाज दोहरे नारे के साथ प्रोत्साहित किए जाए कि। भोजन में जहर नहीं और खेती और हमारी थाली में मोटे अनाज की पहुंच अहम नारे होंगे।

(नारायणी राजश्री कानूनगो नवकृष्ण चौधरी सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, ओडिशा में पोस्टडॉक्टोरल फेलो हैं)